Loading Now

गुरु रविदास जी की वाणी की स्वीकारता विश्वव्यापी, वीरेंद्र कुमार जाटव

गुरु रविदास जी की वाणी की स्वीकारता विश्वव्यापी,
वीरेंद्र कुमार जाटव

बेगमपुरा अवधारणा पर राजनीतिक दलों की सक्रियता के क्या है मायने

सहारा सन्देश टाइम्स

बदायूं। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट के बीच गुरु शिरोमणि संत रविदास महाराज और बेगमपुरा की अवधारणा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आती दिखाई दे रही है। देश में सामाजिक समानता, जाति-विहीन समाज, श्रम की गरिमा और भेदभाव मुक्त व्यवस्था का संदेश देने वाले गुरु रविदास महाराज के करोड़ों अनुयायियों के बीच उनकी विचारधारा की स्वीकार्यता को देखते हुए राजनीतिक दलों की सक्रियता भी लगातार बढ़ रही है*। धार्मिक आस्था के साथ जुड़ा यह विषय अब सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
गुरु रविदास महाराज की 650वीं जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश में वाराणसी स्थित रविदास मंदिर से कलश यात्रा का शुभारंभ और *मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पूजा-अर्चना तथा कार्यक्रम में सहभागिता इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत माना जा सकता है। इस अवसर पर भदोही जिले को पुनः गुरु रविदास महाराज के नाम पर करने की घोषणा ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया है।बहुजन समाज पार्टी की पंजाब इकाई द्वारा दिल्ली स्थित गुरु रविदास मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना करना और वहीं से यात्रा का शुभारंभ किया जाना भी इसी व्यापक राजनीतिक सक्रियता का हिस्सा माना जा सकता है*।पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा गुरु रविदास महाराज से जुड़े वर्षभर के कार्यक्रमों की घोषणा और विभिन्न अवसरों पर बड़े आयोजनों, संगोष्ठियों तथा सेमिनारों की योजना भी इसी राजनीतिक महत्व को दर्शाती है। किसी जिले का नाम किसी महापुरुष के नाम पर रखना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी सामाजिक स्मृति, सम्मान और समुदाय की भावनाओं पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे निर्णयों का चुनावी राजनीति में संदेश दूर तक जाता है।
उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले चुनावों के संदर्भ में गुरु रविदास की विरासत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन राज्यों में दलित और वंचित वर्गों का मत चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। राजनीतिक दल अब केवल पारंपरिक जातीय समीकरणों पर निर्भर नहीं रह सकते। उन्हें धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों, सामाजिक सम्मान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास के मुद्दों को एक साथ साधना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि *गुरु रविदास महाराज किसी एक राजनीतिक दल की विरासत नहीं हैं। उनकी वाणी और विचार मानव समानता तथा सामाजिक न्याय की साझा धरोहर* हैं। उनके अनुयायी भी केवल चुनाव के समय दिखाई देने वाली संख्या नहीं हैं, बल्कि वे अपने अधिकार, सम्मान और भागीदारी के प्रति जागरूक नागरिक हैं। इसलिए आने वाले चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजनीतिक दल गुरु रविदास के नाम और प्रतीक का कितना इस्तेमाल करते हैं और उनकी बेगमपुरा की मूल भावना को अपनी नीतियों में कितना स्थान देते हैं।

*2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीति में यदि गुरु रविदास महाराज की 650वीं जयंती को लेकर कार्यक्रमों की यह श्रृंखला आगे भी तेज होती है, तो यह स्पष्ट होगा कि धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत और चुनावी राजनीति का संबंध और गहरा हो रहा है* लेकिन अंतिम निर्णय श्रद्धालुओं और मतदाताओं के हाथ में होगा। वे केवल श्रद्धा और सम्मान के प्रतीकों को देखेंगे या फिर यह भी परखेंगे कि किस राजनीतिक शक्ति ने सामाजिक बराबरी, सम्मान, शिक्षा, रोजगार और न्याय के वास्तविक सवालों पर काम किया है। संभवतः यही कसौटी गुरु रविदास की बेगमपुरा की अवधारणा को चुनावी राजनीति से जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कसौटी साबित होगी।

Post Comment

मनोरंजन