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बच्चे को ऑस्ट्रेलिया ले जाने के मामले में मां के खिलाफ अपहरण की एफआईआर दर्ज

बच्चे को ऑस्ट्रेलिया ले जाने के मामले में मां के खिलाफ अपहरण की एफआईआर दर्ज

दिल्ली की अदालत के निर्देश पर कार्रवाई; पिता ने अभिभावकीय सहमति के दस्तावेजों पर जाली हस्ताक्षर का आरोप लगाया

सहमति का सत्यापन किसने किया? ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा फॉर्म 1229 की प्रामाणिकता और अभिभावकीय अधिकारों पर उठे सवाल

सहारा सन्देश टाइम्स

नई दिल्ली 16 अक्टूबर 2026: ( ) भारत से एक बच्चे को ऑस्ट्रेलिया ले जाने के मामले में दिल्ली की अदालत के निर्देश पर दर्ज आपराधिक एफआईआर ने कथित जाली अभिभावकीय सहमति और बाल संरक्षण संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। मामला इस प्रश्न को सामने लाता है कि अंतरराष्ट्रीय यात्रा और वीज़ा आवेदन के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता विवादित होने पर बच्चों के हितों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है।

बच्चे के जैविक पिता दमनजीत सिंह का आरोप है कि उनके ढाई वर्षीय बेटे को उनकी अनुमति के बिना भारत से ऑस्ट्रेलिया ले जाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि उनका मूल भारतीय पासपोर्ट चोरी किया गया और बच्चे के ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा आवेदन से संबंधित दस्तावेजों, जिनमें ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा फॉर्म 1229 भी शामिल है, पर उनके जाली हस्ताक्षर किए गए। वह आगे आरोप लगाते हैं कि इसमें किसी एक व्यक्ति के बजाय एक संगठित गिरोह की सुनियोजित साजिश शामिल थी।

मामले का केंद्रीय प्रश्न यह है कि वीज़ा आवेदन में जिस सहमति का आधार लिया गया, क्या वह वास्तविक थी और क्या प्रस्तुत दस्तावेज बच्चे के वीज़ा तथा उसे दूसरे देश में ले जाकर बसाने के लिए आवश्यक कानूनी अधिकार को सही ढंग से स्थापित करते थे। इन आरोपों पर जांच और न्यायिक निर्णय होना बाकी है।

शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, उनकी अधिवक्ता मोनिका वर्मन के माध्यम से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3) के तहत अदालत में कार्यवाही शुरू की गई। यह प्रावधान निर्धारित वैधानिक शर्तों के अधीन सक्षम मजिस्ट्रेट को पुलिस जांच का आदेश देने का अधिकार प्रदान करता है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, नई दिल्ली स्थित तीस हजारी न्यायालय के पश्चिम जिला, जेएमएफसी-07 के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विकास मदान ने तिलक नगर थाना को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके बाद बच्चे की मां के खिलाफ एफआईआर संख्या 0393/2026 दर्ज की गई। शिकायतकर्ता के मुताबिक, एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएं 137(2), 336(3) और 340(2) लगाई गई हैं। ये धाराएं क्रमशः अपहरण के लिए दंड, धोखाधड़ी के उद्देश्य से कूटरचना और कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को असली के रूप में कपटपूर्वक या बेईमानी से इस्तेमाल करने से संबंधित हैं।

एफआईआर दर्ज होने से आरोप आपराधिक जांच की प्रक्रिया में आए हैं। हालांकि, एफआईआर अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करती। वैध अभिभावकत्व, सहमति, दस्तावेजों की प्रामाणिकता और उल्लिखित अपराधों की प्रयोज्यता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है।

ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा फॉर्म 1229 का उपयोग 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे को ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा दिए जाने की सहमति दर्ज करने के लिए किया जाता है। लागू वीज़ा नियमों और पारिवारिक परिस्थितियों के अनुसार, उन व्यक्तियों की सहमति आवश्यक हो सकती है जिन्हें कानूनी रूप से यह तय करने का अधिकार है कि बच्चा कहां रहेगा। संबंधित न्यायालय के आदेश या किसी एक अभिभावक के पास एकमात्र अभिभावकीय जिम्मेदारी होने के प्रमाण जैसे अन्य वैध आधार भी प्रासंगिक हो सकते हैं।

इसी कारण विवादित दस्तावेजों की प्रामाणिकता इस शिकायत का महत्वपूर्ण पहलू है। शिकायतकर्ता का कहना है कि किसी सहमति प्रपत्र का भरा हुआ होना उन हस्ताक्षरों को वैध नहीं बना सकता जो उन्होंने किए ही नहीं। उनके अनुसार, विवादित दस्तावेज की फॉरेंसिक जांच इस मामले की जांच का केंद्रीय हिस्सा होनी चाहिए। साथ ही, वीज़ा दिए जाने की सहमति और बच्चे की अभिरक्षा, अंतरराष्ट्रीय यात्रा तथा स्थायी रूप से दूसरे देश में बसाने के कानूनी अधिकार अलग-अलग प्रश्न हैं।

**बाल संरक्षण की किसी व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल दस्तावेज की उपलब्धता पर नहीं, बल्कि उसकी प्रामाणिकता और कानूनी पर्याप्तता पर निर्भर करती है।** मूल आवेदन अभिलेखों, संलग्न पहचान दस्तावेजों, संबंधित न्यायालय के आदेशों और आवेदन जमा करने से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि आवेदन किस प्रकार तैयार किया गया और किस कानूनी अधिकार के आधार पर प्रस्तुत किया गया।

शिकायतकर्ता का कहना है कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ को भेजे गए अभ्यावेदनों की प्राप्ति की पुष्टि वहां के प्रधानमंत्री एवं मंत्रिमंडल विभाग ने की और मामला गृह मामलों के विभाग को भेजा गया। उन्होंने गृह मामलों के विभाग तथा प्रवासन एजेंट पंजीकरण प्राधिकरण के कार्यालय के साथ हुए पत्राचार का भी उल्लेख किया है। इन अभ्यावेदनों में विवादित वीज़ा दस्तावेजों और उन्हें तैयार करने या जमा करने में संबंधित पेशेवर व्यक्तियों की संभावित भूमिका की जांच का अनुरोध किया गया है।

यह मामला उन कानूनी कठिनाइयों को भी उजागर करता है जिनका सामना परिवारों को तब करना पड़ता है जब बच्चा ऐसे देशों के बीच ले जाया जाता है जहां अभिभावकीय विवादों के समाधान की प्रक्रियाएं अलग हैं। ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय बाल अपहरण के दीवानी पहलुओं पर 1980 के हेग कन्वेंशन का पक्षकार है, जबकि भारत नहीं है। इसलिए इस कन्वेंशन के तहत बच्चे की वापसी की संधि-आधारित व्यवस्था सामान्यतः भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लागू नहीं होती। ऐसी स्थिति में संबंधित देशों के घरेलू कानूनों के तहत उपलब्ध न्यायिक उपायों की पहचान विशेष महत्व रखती है।

अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण के सिद्धांत भी इस मामले में प्रासंगिक हैं। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय का अनुच्छेद 3 बच्चों से संबंधित कार्रवाइयों में बच्चे के सर्वोत्तम हितों को प्राथमिक विचार बनाए जाने की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 11 पक्षकार देशों से बच्चों को अवैध रूप से विदेश ले जाने और वापस न लाए जाने की समस्या से निपटने के लिए उपाय करने को कहता है। सक्षम प्राधिकारियों द्वारा तथ्यों और उपलब्ध कानूनी उपायों का निर्धारण किए जाने के दौरान ये सिद्धांत बच्चों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

इस शिकायत का सार्वजनिक महत्व दो अभिभावकों के बीच लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाती है कि विवादित अभिभावकीय सहमति की जांच कैसे की जाती है, सहायक पहचान दस्तावेजों का सत्यापन किस प्रकार होता है और दस्तावेजों की प्रामाणिकता से जुड़ी विश्वसनीय शिकायतों का समाधान करते समय बच्चे के कल्याण को केंद्र में कैसे रखा जाता है।

गहन और साक्ष्य-आधारित जांच आव्रजन प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता के साथ-साथ संबंधित पक्षों के अधिकारों की रक्षा कर सकती है। आपराधिक कार्यवाही, आव्रजन प्रशासन और अभिभावकीय अधिकारों से संबंधित न्यायिक कार्यवाही की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रत्येक प्रक्रिया में उसके अधिकार-क्षेत्र के विषयों का निपटारा कानून के अनुसार किया जाना आवश्यक है।

इस मामले के मूल में अभिभावकीय सहमति संबंधी सुरक्षा व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न है—क्या अभिलेख वास्तविक अनुमति स्थापित करते हैं, क्या कानूनी आवश्यकताओं का पालन हुआ और इन प्रश्नों के समाधान तक बच्चे के कल्याण की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है। — समाप्त —

आपकी जानकारी के लिए संलग्न दस्तावेज:
एफआईआर की कॉपी
अदालत के आदेश की कॉपी
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के विभाग का पत्र
ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री का पत्र
अधिक जानकारी एवं मीडिया संपर्क:
अधिवक्ता मोनिका वर्मन
फोन: +91 9891043618

शिकायतकर्ता पिता:
दमनजीत सिंह
फोन: +91 8810678310

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