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सरकारी उपेक्षा का शिकार हमीरपुर का प्रसिद्ध “नागरा” जूती उद्योग,वीरेंद्र कुमार जाटव

 

सरकारी उपेक्षा का शिकार हमीरपुर का प्रसिद्ध “नागरा” जूती उद्योग,वीरेंद्र कुमार जाटव

सहारा सन्देश टाइम्स

“वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना में शामिल होने के बावजूद बदहाली के आंसू बहा रहा हमीरपुर का नागरा जूती उद्योग, आखिर क्यों नहीं बच पा रही पुश्तैनी विरासत?”

” उत्तर प्रदेश सरकार इस संदर्भ में अपेक्षित जूती उद्योग को संरक्षित एवं संवर्धन लिए अविलंब जरूरी काम उठाएं एवं सरकारी ऋण अनुदान और मार्केटिंग स्ट्रेटजी तैयार करें ”

” इस जूती की खासियत यह है कि इसे पहनकर चलने पर एक अलग तरह की चर्र-चर्र की आवाज निकलती है। यही इसकी पहचान और आकर्षण रहा है ”

” कभी 40 से अधिक लोग इस कारोबार से जुड़े थे, लेकिन अब महज 13 लोग ही इसे किसी तरह जिंदा रखे हुए हैं। पिछले तीन वर्षों में ही कई कारीगर इस व्यवसाय को छोड़ चुके हैं।”

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के सुमेरपुर कस्बे की नागरा जूती कभी अपनी खूबसूरती, हल्के वजन, टिकाऊपन और विशिष्ट पहचान के लिए मशहूर रही है। बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि राजस्थान, दिल्ली, बिहार, हरियाणा समेत देश के कई राज्यों में इसकी मांग रही है। इस जूती की खासियत यह है कि इसे पहनकर चलने पर एक अलग तरह की चर्र-चर्र की आवाज निकलती है। यही इसकी पहचान और आकर्षण रहा है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस पारंपरिक उद्योग ने कई पीढ़ियों को रोजगार दिया और हमीरपुर को देशभर में पहचान दिलाई, वही उद्योग आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

योगी सरकार ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सुमेरपुर की नागरा जूती को एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल करके इसे नई पहचान देने का प्रयास जरूर किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल किसी उत्पाद को सरकारी योजना में शामिल कर देने से उसका भविष्य सुरक्षित हो जाता है? यदि ऐसा होता तो आज नागरा जूती बनाने वाले कारीगरों की संख्या लगातार घट नहीं रही होती। उद्योग की वास्तविक स्थिति यह है कि कभी 40 से अधिक लोग इस कारोबार से जुड़े थे, लेकिन अब महज 13 लोग ही इसे किसी तरह जिंदा रखे हुए हैं। पिछले तीन वर्षों में ही कई कारीगर इस व्यवसाय को छोड़ चुके हैं।

सुमेरपुर कस्बे में थाने के पास कई दशकों से नागरा जूती बनाने का कारोबार संचालित हो रहा है। कारोबारियों के मुताबिक चमड़े की नागरा जूती बनाने की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई थी। उस समय केवल सात लोग इस काम में लगे थे। धीरे-धीरे इस कारोबार ने विस्तार किया और इसकी लोकप्रियता बुंदेलखंड से बाहर तक पहुंच गई। दिनेश, सर्वेश कुमार वर्मा और वंश गोपाल समेत अन्य कारोबारियों का कहना है कि एक समय ऐसा था जब यहां तैयार होने वाली जूतियों की मांग इतनी अधिक थी कि कारीगरों को काम की कमी नहीं रहती थी। 300 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक की कीमत वाली ये जूतियां अपनी मजबूती और हल्केपन के कारण अलग पहचान रखती हैं।

एक और महत्वपूर्ण सवाल हमीरपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी की ओर से परिवारों और कारीगरों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए किए गए वादे से जुड़ा है। स्थानीय स्तर पर यह बात कही गई थी कि संबंधित परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये का अनुदान उपलब्ध कराने और इसके लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा शुरू करने की व्यवस्था की जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि यह घोषणा आज तक जमीन पर क्यों नहीं उतर पाई? यदि पांच लाख रुपये की सहायता का आश्वासन दिया गया था तो संबंधित परिवारों को उसका लाभ क्यों नहीं मिला? ऑनलाइन आवेदन की सुविधा शुरू करने की बात कही गई थी तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है? क्या जिला प्रशासन ने इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई की? यदि योजना लागू नहीं हुई तो इसके लिए जवाबदेह कौन है? जिला प्रशासन को इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
आज स्थिति यह है कि कभी 40 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाला नागरा जूती उद्योग सिमटकर महज 13 कारोबारियों तक रह गया है। यह गिरावट अपने आप में एक चेतावनी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हमीरपुर की यह पहचान केवल पुराने लोगों की यादों और सरकारी दस्तावेजों में सिमटकर रह जाएगी।हमीरपुर की नागरा जूती को बचाने के लिए अब घोषणाओं और आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। क्योंकि किसी भी पारंपरिक उद्योग की असली पहचान उसका उत्पाद नहीं, बल्कि उस उत्पाद को अपने हुनर और मेहनत से तैयार करने वाले कारीगर होते हैं। यदि कारीगर ही नहीं बचेंगे तो नागरा जूती की पहचान भी कैसे बचेगी?

वीरेंद्र कुमार जाटव,
राजनीतिक विश्लेषक एवं राष्ट्रीय सचेतक समता सैनिक दल

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