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31वां सूफी हसीनुद्दीन शाह उर्स: नांगल में सूफी शाकिर शाह की देखरेख में उत्सव

31वां सूफी हसीनुद्दीन शाह उर्स: नांगल में सूफी शाकिर शाह की देखरेख में उत्सव

 

सहारा सन्देश टाइम्स

चांदपुर (बिजनौर)।  उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के ग्राम नांगल, थाना हीमपुर दीपा, तहसील चांदपुर में सूफी शाह मलंग प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित 31वां सूफी हसीनुद्दीन शाह उर्स मुबारक सूफी शाकिर शाह की देखरेख में धूमधाम और आध्यात्मिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ। यह वार्षिक आयोजन सूफी संत हसीनुद्दीन शाह की स्मृति में आयोजित किया गया, जिन्हें उनके प्रेम, करुणा और सामाजिक एकता के संदेशों के लिए जाना जाता है। सूफी शाकिर शाह की अगुवाई में यह आयोजन आध्यात्मिकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया

*उर्स का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व*
सूफी हसीनुद्दीन शाह, जिन्हें स्थानीय लोग “शाह मलंग” के नाम से सम्मान देते हैं, एक प्रसिद्ध सूफी संत थे, जिन्होंने अपनी शिक्षाओं के माध्यम से प्रेम, भाईचारा और मानवता के मूल्यों को बढ़ावा दिया। उनकी दरगाह ग्राम नांगल में आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु उनके उर्स में शामिल होने आते हैं। सूफी शाह मलंग प्रकोष्ठ, जो संत के दर्शन को जीवित रखने और समाज में एकता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है, इस आयोजन को भव्य रूप से आयोजित करता है। इस वर्ष 31वां उर्स सामाजिक समरसता और सूफी परंपराओं के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बना।

*चादरपोशी और जुलूस:* उर्स की शुरुआत दरगाह पर चादरपोशी की रस्म के साथ हुई, जिसमें सूफी शाकिर शाह ने संत की मजार पर चादर चढ़ाई। इसके बाद, ग्राम नांगल के मुख्य मार्गों से एक भव्य जुलूस निकाला गया। जुलूस में ढोल-नगाड़ों और सूफी कलामों की गूंज के बीच श्रद्धालु शामिल हुए, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता का प्रतीक बना।

कव्वाली और सूफी संगीत: सूफी संगीत की मधुर प्रस्तुतियों ने आयोजन में चार चांद लगाए। प्रख्यात कव्वालों ने हसीनुद्दीन शाह की शिक्षाओं पर आधारित रचनाएं प्रस्तुत कीं, जिन्होंने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिकता के रंग में डुबो दिया। कव्वाली की महफिल रातभर चली, जिसमें “अल्लाह हू” और “दमादम मस्त कलंदर” जैसे लोकप्रिय सूफी कलाम गूंजे।

*लंगर का आयोजन:* सूफी परंपरा के अनुरूप, लंगर (सामुदायिक भोज) का आयोजन किया गया, जिसमें सभी धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। यह लंगर सामाजिक समानता और भाईचारे का प्रतीक रहा, जहां सैकड़ों लोगों ने एक साथ भोजन किया।

*सूफी शिक्षाओं पर प्रवचन:* प्रख्यात सूफी विद्वानों और स्थानीय धर्मगुरुओं ने हसीनुद्दीन शाह के जीवन और दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे सूफी संतों ने भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा दिया। विशेष रूप से, संत की शिक्षाओं में प्रेम, सहिष्णुता और मानवता के महत्व पर जोर दिया गया।

*कुल शरीफ और दुआ:* उर्स का समापन कुल शरीफ की रस्म के साथ हुआ, जिसमें संत की आत्मा की शांति के लिए सामूहिक दुआएं मांगी गईं। इस रस्म में दरगाह पर मौजूद सभी श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

*सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान*
31वां सूफी हसीनुद्दीन शाह उर्स मुबारक ने ग्राम नांगल को एक बार फिर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। यह आयोजन विभिन्न समुदायों के बीच एकता का प्रतीक बना, जहां हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु एक साथ दरगाह पर मत्था टेकने और दुआ मांगने आए। सूफी शाह मलंग प्रकोष्ठ ने इस अवसर पर सामाजिक कल्याण के लिए कई पहल भी शुरू कीं, जैसे गरीबों के लिए मुफ्त चिकित्सा शिविर, जरूरतमंद बच्चों के लिए शैक्षिक सामग्री का वितरण और पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण अभियान।

*स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था*
हिमपुरदीपा थाना प्रशासन ने इस आयोजन के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की थीं। जुलूस और दरगाह पर सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया था। इसके अलावा, ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रखने और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे। आयोजन के दौरान स्वच्छता और पेयजल की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई थी, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

*सूफी शाकिर शाह की भूमिका*
सूफी शाकिर शाह, जो सूफी शाह मलंग प्रकोष्ठ के प्रमुख संरक्षक और आयोजक हैं, ने इस उर्स को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी देखरेख में आयोजन की सभी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से संपन्न हुईं। सूफी शाकिर शाह ने अपने संबोधन में कहा, “हसीनुद्दीन शाह का संदेश प्रेम और एकता का है, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक है। हमारा प्रयास है कि उनकी शिक्षाएं समाज के हर वर्ग तक पहुंचें और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करें।”

31वां सूफी हसीनुद्दीन शाह उर्स मुबारक ग्राम नांगल, चांदपुर में सूफी परंपराओं और सामाजिक एकता का एक जीवंत उत्सव साबित हुआ। यह आयोजन न केवल हसीनुद्दीन शाह की विरासत को सम्मानित करता है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को भी दर्शाता है। सूफी शाह मलंग प्रकोष्ठ की यह पहल समाज में प्रेम, शांति और भाईचारे के मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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