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शनिचरी और सर्व पितृ अमावस्या के दुर्लभ संयोग में घाटों पर हुआ स्नान

शनिचरी और सर्व पितृ अमावस्या के दुर्लभ संयोग में घाटों पर हुआ स्नान

-सिद्धवट से त्रिवेणी तक पितरों के तर्पण-श्राद्ध का दौर- शनिदेव को चढ़ाया तेल , त्रिवेणी पर छोड़े गए कपड़े और जूते चप्पल

सहारा सन्देश टाइम्स

उज्जैन। पितरों के तर्पण की आस्था, शनिदेव के दर्शन की आस और गजछाया योग का दुर्लभ संयोग में शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पर उज्जैन के घाटों पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। सिद्धवट से त्रिवेणी शनि मंदिर तक रात से ही श्रद्धालुओं की कतारें लग गईं। कोई पितरों की शांति के लिए तर्पण-श्राद्ध करने पहुंचा, तो कोई शनिदेव को तेल चढ़ाकर मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करता नजर आया। वहीं घरों में भी पितरों का धूप ध्यान किया गया।

शनिवार को विशेष संयोग के बीच सुबह 5 बजे से ही सिद्धवट घाट पर पितृ कर्म शुरू हो गए। शिप्रा के घाटों पर स्नान, मंदिरों में दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच पूरी धर्मनगरी आस्था के रंग में रंगी नजर आई। श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन आज सर्वपितृ अमावस्या पर उन पितरों के निमित्त भी तर्पण और श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारण से उनका श्राद्ध नहीं हो पाया। इसी मान्यता के चलते देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचे। सिद्धवट घाट पर लोगों ने विधि-विधान से तर्पण किया और पितरों की आत्मशांति के लिए पूजा-अर्चना की। दूसरी ओर, शनिश्चरी अमावस्या के चलते त्रिवेणी शनि मंदिर में शुक्रवार रात 12 बजे से ही दर्शनार्थियों का पहुंचना शुरू हो गया था। सुबह होते-होते यहां भी कतारें लंबी हो गईं।
इस बार सर्वपितृ अमावस्या पर शनिवार और गजछाया योग का संयोग धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि जब अमावस्या हस्त नक्षत्र में आती है, तब गजछाया या कुंजरछाया योग बनता है। इस बार सूर्य और चंद्रमा का कन्या राशि में गोचर तथा हस्त नक्षत्र का संयोग इस योग का निर्माण कर रहा है। इसे पितरों के निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में अलग-अलग ग्रह स्थितियों और योगों का महत्व होता है। जो लोग पूरे पखवाड़े में पितरों के निमित्त तर्पण-श्राद्ध नहीं कर पाते, वे सर्वपितृ अमावस्या पर यह कर्म कर सकते हैं। वैदिक मान्यता में सूर्य और चंद्रमा को पितृ कर्मों का साक्षी माना गया है। इस दिन तर्पण, श्राद्ध और पूजा-अर्चना करने की परंपरा इसी धार्मिक विश्वास से जुड़ी है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान ग्रह स्थिति में शनि मीन राशि और बृहस्पति कर्क राशि में हैं। बृहस्पति की नौवीं दृष्टि शनि पर पड़ रही है। ज्योतिष शास्त्र में दोनों ग्रहों को धर्म और अध्यात्म से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में इस संयोग के दौरान किए जाने वाले धार्मिक कर्मों को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

सिद्धवट पर सुबह 5 बजे से तर्पण, यातायात में बदलाव….

पितरों के निमित्त कर्मकांड के लिए सिद्धवट घाट पर रात से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। सुबह 5 बजे से तर्पण और पूजन का सिलसिला तेज हो गया। घाट पर बड़ी संख्या में लोग पंडितों के माध्यम से विधि-विधान से श्राद्ध कर्म कराते नजर आए। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए पुलिस ने यातायात व्यवस्था में बदलाव किया। चार पहिया वाहनों के लिए मंगलनाथ से भैरवगढ़ और भैरवगढ़ से सिद्धवट की ओर निर्धारित मार्ग से आवाजाही की व्यवस्था की गई, ताकि घाट क्षेत्र में जाम की स्थिति न बने।

सर्वपितृ अमावस्या पर सिद्धवट का विशेष महत्व माना जाता है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। जिन परिवारों में पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाता, वे भी इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करते हैं।

त्रिवेणी शनि मंदिर में आधी रात से कतारें…

शनिश्चरी अमावस्या के चलते त्रिवेणी स्थित शनि मंदिर में शुक्रवार रात 12 बजे से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई थी। शनिदेव के दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। श्रद्धालु तेल, काली उड़द, फूल और प्रसाद लेकर मंदिर पहुंचे तथा भगवान शनि का पूजन किया।

श्रद्धालुओं के स्नान के लिए शिप्रा के पानी की व्यवस्था की गई है। नदी में फव्वारे लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से लोग स्नान कर रहे हैं। व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं को नदी में उतरकर सीधे डुबकी लगाने की अनुमति नहीं दी गई है। स्नान और दर्शन के लिए पहुंचने वाले लोगों की भीड़ को व्यवस्थित रखने के इंतजाम किए गए हैं।

केडी पैलेस पर भी जुटे लोग, परंपराओं का निर्वहन….

सर्वपितृ अमावस्या पर आज सुबह केडी पैलेस स्थित शिप्रा घाट पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। यहां स्नान और पूजा-अर्चना के साथ कुछ लोग भूत-प्रेत बाधा और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति की धार्मिक मान्यता के चलते विशेष परंपराओं का पालन करते नजर आए। कुछ श्रद्धालु हाथों में जंजीरें और तलवारें लिए पहुंचे, जबकि कई लोग अलग-अलग तरह की आवाजें निकालते दिखाई दिए। यह गतिविधियां स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़ी हैं।

चढ़ावे के तेल की 24 घंटे बाद नीलामी…

शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव को चढ़ाए जाने वाले तेल का उपयोग भी अलग व्यवस्था के तहत किया जाएगा। श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए तेल की 24 घंटे बाद नीलामी की जाएगी। इससे मिलने वाली राशि का उपयोग विभिन्न प्रकल्पों में किया जाएगा। इस व्यवस्था के तहत चढ़ावे से प्राप्त संसाधनों को उपयोग में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

घाटों पर छोड़े कपड़े-जूते होंगे पुनर्चक्रित…

धार्मिक आस्था के चलते मन्नत के नाम पर छोड़े जाने वाले कपड़ों और स्नान के बाद घाटों पर छोड़ दिए जाने वाले जूते-चप्पलों का भी पुन: उपयोग किया जाएगा। इन्हें एकत्र कर पुनर्चक्रण के लिए भेजने की योजना है। इनसे फाइल कवर और तेल जैसे उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इससे घाटों पर जमा होने वाली अनुपयोगी सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकेगा और कचरा कम करने में भी मदद मिलेगी।

सर्वपितृ अमावस्या पर उज्जैन के घाटों पर पितरों के प्रति श्रद्धा और शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव के प्रति आस्था एक साथ नजर आई। सिद्धवट पर तर्पण-श्राद्ध, त्रिवेणी में शनिदेव के दर्शन और केडी पैलेस पर स्थानीय धार्मिक परंपराओं के निर्वहन के बीच सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही।

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